Please Do not try to copy content

Sunday, April 21, 2019

सुलझी हुई बाते | हिंदी कहानी । sulji hoyi batein | Hindi kahani



सुलझी हुई बातें | हिन्दी कहानी | Hindi Kahani


जीवन की कठिनाईयां और जीवन जीने की चाह लोगो को इतना मजबूत कर देती है यह उनकी बातों से भी झलकने लगता है। ऊँचे विचार और सुलझी हुई सोच, यह जरूरी नही कि पढ़े लिखे लोगो के दिमाग मे ही आए। सोच, विचार यह सब जीवन ही सिखाता है। ऐसा मुझे तब महसूस हुआ जब मैंने अपने घर पर  काम कर रहे मजदूर की बातें सुनी।



   बात उन दिनो की है जब हमारे घर मे नया कमरा बनाने के लिए मिस्त्री और मजदूर काम कर रहे थे। रोज के रोज उनका काम पे आना और अपने काम के प्रति उनका लगाव देख के मे बहुत खुश था। उन दिनो गर्मी अपनी पूरी चरम सीमा पर थी। लेकिन फिर भी मिस्त्री और मजदूर अपनी थकावट दूर करने के लिए दो टाईम चाय पिया करते थे। मैं अक्सर उन से बातें करता हुआ मजाक मजाक मे कुछ ना कुछ बोल देता था। वो कभी भी गुस्सा नही करते थे और इतनी गर्मी मे भी अपना स्वभाव ठंडा रखते थे।

 एक दिन बहुत ज्यादा गर्मी थी। एक मजदूर ईंटे उठा रहा था तो मैंने उस से पूछ लिया कि भाई इतनी गर्मी मे तुम लोग काम कैसे कर लेते हो । तो उसने बड़ी ही सादगी से मुझे जबाब दिया कि जैसे सूरज खुद जलकर पूरी दुनिया को रोशनी देता है उसी प्रकार हमे अपने परिवार को पालने के लिए कढ़ी मेहनत की आग मे जलना पड़ता है। यह बात सुनकर मैं एक दम हैरान रह गया ।

     मैंने उसे कहा कि तुम बहुत पढे लिखे लगते हो जो इतनी सुलझी हुई बात कर रहे हो। उसने बताया कि वो सिर्फ दसवीं तक पढ़ा है। यह बात मुझे जीवन भर याद रहेगी। तो दोस्तो कुछ बढि़या बाते सीखने के लिए जरूरी नही कि हम बहुत सारी किताबे पढ़े, हम अपने आस पास काम कर रहे लोगो से भी बहुत कुछ सीख सकते है।



<

Thursday, December 20, 2018

संतुष्टि की दौड़ | Santoshti ki daud | Hindi Kahani ( हिंदी कहानी )

आज दुनिया मे ऐश, आराम और पैसे के मुकाबले मे सभी एक दूसरे से आगे निकलना चाहते है। यह सब पाने के लिए लोग यह नही देखते के यह सब कठिन मेहनत के बिना संभव नही है। वह गलत रास्ते चुन कर रातो रात अमीर होना चाहते है । इसी मुकाबले मे एक ऐसा व्यक्ति फंस जाता है जो जीवन को कम आमदन मे भी बेहतर ढंग से चला रहा था।

    रमेश एक प्राइवेट कंपनी मे सुपरवाइजर के पद पर काम करता था। अच्छी भली आमदन थी। घर का सारा खर्च निकाल कर अच्छी बचत भी हो जाती  । कोई भी तनाव वाला काम नही था। कंपनी मे काम खत्म करके रमेश अक्सर घर जल्दी आ जाता  । घर जल्दी आने की वजह से वह अपने घर परिवार के लोगो को भी समय दे पाता । और वह अपने घर के कामो मे भी मदद कर देता । बाजार के कामो के लिए भी बहुत समय मिल जाता ।



         रमेश का एक दोस्त  कमल उसी के साथ उसकी कंपनी मे काम करता था पर दूसरी नौकरी मिलने के कारण उसने कंपनी छोड़ दी थी । कुछ महीनो बाद कमल के बारे मे बातें फैलने लगी कि वह अच्छा पैसा कमा रहा है । कंपनी मे रमेश ने भी अपने साथ काम करने वालो से यही सुना कि वह बहुत अधिक पैसे कमा रहा है अगर वो ऐसे ही काम करता रहा तो बहुत जल्दी अमीर हो जाएगा। यह सब सुनकर रमेश  गहरी सोच मे पड़ गया कि कमल को ऐसी कौन सी नौकरी मिल गई जिससे वो रातो रात अमीर हो जाएगा।

    कम्पनी मे  कमल के बारे मे बाते होने लगी। मानो कमल लोगो की नजर मे बहुत अमीर व्यक्ति बन गया हो। कुछ दिनो बाद ही कमल ने नई कार भी खरीद ली। यह बात भी आग की तरह चारो तरफ फैल गई । रमेश को भी इस बात का पता चला तो वह हैरान रह गया। रमेश सोच मे पड़ गया । अब उसके दिमाग मे भी कमल की तरह ज्यादा पैसे कमाने की चाहत पैदा होने लगी। कंपनी की ज्यादातर कर्मचारी कमल जैसा बनने की सोचते रहते ।

        रमेश के मन अन्दर भी ज्यादा पैसे कमाने के ख्याल आने लगे । उधर दिन बीतते ही कमल अमीर होता चला गया । किसी ने भी यह नही सोचा के वह काम क्या करता है। लोगो को उसकी अमीरी दिख रही थी और यह रातो रात आई अमीरी की चमक लोगो की आंखे मे भी अमीर बनने के सपने दिखा रही थी। रमेश इस दौड़ मे पहले नम्बर पर था। यहा तक कि यह जनून रमेश के परिवार वालो मे भी दिखने लगा था।

   रमेश जब भी काम से घर आता तो परिवार के लोग उससे कमल के साथ काम करने के लिए बोलते। अब सभी को कमल जैसे आराम के लिए अपनी जरूरते बढ़ती दिखने लगी। यह ना खत्म होने वाली जरूरते पूरी करने के लिए बहुत सारे पैसो की आवश्यकता थी। तो यही जरूरते रमेश को कमल के पास काम मांगने के लिए मजबूर कर देती है। जब वह कमल के पास काम के लिए पूछताछ करने के लिए गया तो कमल की बात सुनकर वह हैरान रह गया। कमल ने उसे बताया के काम बहुत आसान है बस कुछ सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना होता है।

      रमेश उसकी सारी बात सुनकर कर घर आ गया। उसे लगा कि यह काम तो बहुत आसान है और वह भी काम कर लेगा। पर रात को जब वह सोने गया तो उस के मन मे यह चलने लगा कि जरूर कुछ ना कुछ गडबड है। कोई भी आसान काम रातो रात किसी को भी अमीर नही बना सकता। दूसरे दिन रमेश कमल के पास नही गया और कंपनी मे काम करते हुए भी उसका मन बैचेन था।

     अगले दिन जब वह काम पे जाता है तो कंपनी का एक कर्मचारी उसके पास आता है और हैरान हुआ बोलता है कि उसे कमल के अमीर होने का मंत्र पता चल चुका है। रमेश ने जब उसे कहा कि वो मंत्र मुझे भी बता दे। तो उस कर्मचारी ने रमेश के हाथ मे अखबार पकड़ा दी। अखबार मे कमल की फोटो आई हुई थी। नशा तसकरी के जुर्म मे उसे पुलिस वालो ने पकड़ लिया था । अब रमेश को सारी कहानी समझ आ चुकी थी।  कमल के पास ना जाने का फैसला उसे सही लगा । उसके मन की बैचेनी खत्म हो चुकी थी।

      रमेश अब फिर से अपने काम से संतुष्ट रहने लगा । इस घटना के बाद उसका जीवन और अच्छा और संतोषजनक हो गया। जरूरते सभी की होती है सभी अपने जीवन का स्तर ऊंचा उठाना चाहते है। पर दुनिया मे कोई भी ऐसा आसान रास्ता नही है जो आपको रातो रात अमीर बना दे। इसलिए अपने जीवन से अपने काम से संतुष्टि रखे और निरन्तर आगे बढ़ने के प्रयत्न करे।


                          Hindi Kahani
   






  

Tuesday, November 6, 2018

खुशी के दीपक | khushi k deepak | Hindi Kahani


HAPPY DIWALI TO ALL OF YOU


प्यार और खुशियां बांटने से यह दोगुनी होने के  साथ साथ    हमारे आसपास का माहौल भी खुशियो से भर जाता है। इस बात को मैनें ठीक से तब महसूस किया जब मै पढ़ने के लिए   बस से शहर तक का सफर करता था। रास्ते मे कुछ  कुम्हारो के कच्चे घर  आते और कुम्हार घरो के बाहर बैठे मिट्टी के बर्तन बनाते रहते  । मै वहा काम करते कुम्हारो  को देखकर अक्सर भावुक हो जाता और उनके रहन सहन के बारे मे सोचने लगता।

        रोज उनके सामने से गुजरते हुए भावुकता का एहसास होता। बस जब उनकी बस्ती से थोड़ी दूर आगे जाती, रास्ते मे छोटे छोटे बच्चे  पैदल अपने स्कूल की तरफ जाया करते। वह बच्चे उन्ही कुम्हारो के बच्चे थे जो मुझे रास्ते मे दिखाई देते। गरीब परिवारो से होने के कारण ना तो उनके पास कोई साईकिल था और ना ही वह बस मे सफर कर सकते थे । बस का कंडक्टर भी उन्हे बड़े भावुकता से देखा करता  ।



      एक दिन कंडक्टर ने बस कुम्हारो की बस्ती के सामने रुकवा ली। कंडक्टर बस से नीचे उतर उन कुम्हारो के पास जा के कुछ बातचीत करने लगा । मेरे मन मे एक बार तो आया के कुम्हारो और कंडक्टर के बीच क्या बातचीत हुई होगी । दूसरे दिन जब बस कुम्हारो की बस्ती के पास गई और कंडक्टर ने फिर से बस रुकवा ली पर इस बार वो उतरा नही बल्कि कुम्हारो के बच्चे बस मे चढ़ गए । यह देखकर मुझे बहुत खुशी हुई ।  हैरानी तो मुझे तब हुई जब कंडक्टर ने बिना टिकट के उन बच्चो को स्कूल के सामने उतार दिया । इस बात से मुझे और भी खुशी हुई और मै उस समय कंडक्टर और कुम्हारो के बीच हुई बातचीत को समझ चुका था ।

    अब रोज ही बच्चे बस मे स्कूल जाने लगे । बस का ड्राइवर अक्सर जब बस बस्ती के सामने रूकती तो गुस्से मे आ जाता । एक दिन मे आगे वाली सीट पर बैठा हुआ था । ड्राइवर ने कंडक्टर से कहा के तुम इन बच्चो के चक्कर मे बस को देरी करवा देते हो और इनसे किराया भी नही लेते । कंडक्टर मुस्कुरा दिया और बोला कि इनकी खुशी ही हमारा किराया है। कंडक्टर ने ड्राइवर को गुस्सा ना करने को कहा ।

      ऐसे ही दिन बीतते चले गए । दीवाली का त्योहार पास आ गया । कुम्हारो की दुकाने सज गई,  तरह तरह के मिट्टी से बने दिए सबको आकर्षित करने लगे । दीवाली से दो दिन पहले स्कूल जाने के लिए जब बच्चे बस मे चढ़े तो उनके हाथ  मे दो थैले  पकड़े हुए थे । वह थैले  बहुत भारी लग रहे थे । उन बच्चो ने थैले  कंडक्टर को दे दिए और कंडक्टर से कहा कि एक थैला ड्राइवर अंकल को दे दें।

       कंडक्टर ने एक थैला ड्राइवर की सीट के पास रख दिया और कहा कि यह कुम्हारो के बच्चे तुम्हारे लिए लाए है ।  शाम को जब कंडक्टर और ड्राइवर अपने काम से घर चले गए, ड्राइवर ने घर पहुंच कर उस थैले  को खोला तो उसकी आंखे खुशी से नम हो गई । उस थैले   मे बहुत सरे दीपक थे।  दीवाली के बाद जब फिर से स्कूल शुरू हुए तो ड्राइवर खुद ही कुम्हारो की बस्ती के सामने बस को रोक देता और खुशी खुशी बच्चो को बस मे चढ़ा लेता।

     

Tuesday, October 2, 2018

सकारात्मकता - सफलता की नींव | positivity - the base of success | Hindi kahani

जिंदगी के संघर्ष मे हार कर बैठना और इस हार के लिए बार-बार अपनी किस्मत को दोष देना, सिर्फ संघर्ष ना करने का बहाना मात्र है। यह छोटी सी कहानी भी इसी तरह के संघर्ष के ऊपर आधारित है । राहुल जो अपनी जिंदगी मे एक अच्छी नौकरी के लिए संघर्ष कर रहा है ।

   

    उसे लगातार दो साल हो गए नौकरी के लिए परीक्षा देते हुए , पर हर बार असफल हो जाता । असफलता का बोझ उस के दिमाग पर हावी होने लगा । एक बार तो वो 2 अंको से रह गया। इस बात का उसे बहुत अफसोस होने लगा। उसकी हिम्मत ने अब जबाब दे दिया। उस ने अपने आसपास नकारात्मकता का वातावरण बना लिया।

    राहुल इस का दोष अपनी किस्मत को देने लगा। परिवार और  लोगो की बाते सुन सुन के उसकी नकारात्मकता बढ़ने लगी ।  उसे लगने लगा कि नौकरी उसकी किस्मत मे नही । इस हालात मे उसने अपने जीवन को समाप्त करने के बारे मे सोच लिया । उसके दिमाग मे जरा भी ख्याल ना आया कि उसके बाद उसके परिवार के ऊपर क्या बीतेगी।

    राहुल अब अपना जीवन समाप्त करने के लिए घर से निकल पड़ा । रास्ते मे जाते हुए उसके मन मे एक डर सा भी था, पर उसके दिमाग मे अपने जीवन को समाप्त करने का भूत चढ़ चुका था । राहुल एक नदी किनारे पहुंचा। जैसे ही वो नदी मे कूदने लगता है , अचानक उसकी नजर एक पंछी पर पड़ जाती है ।

    पक्षी  पानी मे से मछली पकड़ने की कोशिश कर रहा था। पक्षी  अपनी चोंच पानी के अंदर ले जाता, पर कोई भी मछली उसकी चोंच मे नही आती। वो हर बार अपनी जगह बदलता, कभी पानी के बाहर आता और कभी अन्दर जाता मछली पकड़ने के लिए । राहुल किनारे पर खड़ा उस पक्षी  की हरकतो को बड़ी गौर से देखता है। 

   20 25 बार कोशिश करने बाद वो पक्षी  पानी से बाहर चला जाता है। 2 मिनट बाद वो पंछी फिर पानी मे उतरता है। वो एक स्थान पर बिना  हिले जुले खड़ा रहता है, मानो उसने इस बार मछली पकड़ने का पूरा मन बना लिया हो। इतने एक मछली उसके पास आती है। वो जल्दी से अपनी चोंच पानी अन्दर डालता है और इस बार मछली उसके चोंच मे आ जाती है ।

  यह घटना देखकर राहुल का मन बदल जाता है,  मानो जैसे उस पंछी ने राहुल के अन्दर सकारात्मकता भर दी हो । वो घर वापस चला जाता है । राहुल फिर से दिन रात मेहनत करता है । उसे जल्द ही नौकरी मिल जाती है । तो दोस्तो किस्मत को दोष देने से ज्यादा अपनी मेहनत पर विश्वास रखना चाहिए । कुदरत सबको एक जैसे मौके देती है। इन अवसरो का सही इस्तेमाल करना हमारे हाथ मे ही होता है। कभी भी अपने अन्दर नकारात्मकता ना आने दे और मेहनत करते रहे एक ना एक आपको सफलता जरूर मिलेगी ।


Friday, September 21, 2018

कहानी (kahani)- बंटवारे की दीवार | Bantware ki deewar | Hindi Kahani

खुले असमान की छत और हवाओं की ये दीवारे इंसानो को रास नही आई,  तो उसने लालच की दीवारो के ऊपर घमंड की छत डाल कर रहना शुरू कर दिया । पर उसका अपना ही खून इस झूठे आशियाने के टुकड़े टुकड़े करता रहा। इसी परंपरा को सच करती यह दो भाईयों की कहानी है ।



       सुनील और मुनीश दो भाई है जो अपनी अपनी पत्नी और बच्चो के साथ रहते है । इन भाइयों का बाप जो अपने भाई से अपने हिस्से की जमीन लेकर अलग हुआ,  उस पर बड़ी मेहनत से एक छोटा सा घर बनाता है । वो अपने आप को इस छोटे से घर का राजा और अपने दोनो बेटो को राजकुमार समझता है ।

    एक दिन मुनीश अपने दोस्तो के बीच खड़ा बाते कर रहा होता है । उसका दोस्त उसे कहता है कि तेरा बाप सुनील के बच्चो से बहुत प्यार करता है,  क्या वो बंटवारे के टाईम घर का ज्यादा हिस्सा उन्हें देगा। बाद मे उसका दोस्त यह कहकर बात टाल देता है कि उसने यह बात हँसी मजाक
मे कही है। पर कभी कभी बाहर वालो का मजाक इंसान के अंदर चिंता पैदा कर देता है । मुनीश भी इसी चिंता को अपने साथ घर ले जाता है ।

      मुनीश रात को अचानक ही यह बात अपनी पत्नी को बता बैठता है। अब उसकी पत्नी के मन मे भी अपने हिस्से को लेकर चिंता होने लगती है जिस के बारे मे उसने कभी सोचा ही नही । सुबह जब दोनो काम कर रही होती है मुनीश की पत्नी सुनील की पत्नी को यह बात बता कर अपने मन को हल्का करना चाहती है । वो सुनील की पत्नी को कहती है कि वो अपने घर मे इस से अच्छी रसोई बनाएगी। अब सुनील की पत्नी बात समझ जाती है ।

                    अब सुनील की पत्नी भी अपने हिस्से को लेकर चिंता से घिर जाती है । अब दोनो भाईयो और उनकी पत्नियो के बीच इसी को लेकर कहा सुनी लगी रहती । दोनो अलग अलग रहने की बात करने लगे। तंग आकर बाप ने घर के दो हिस्से कर दिए  और बीच मे दीवार कर दी। अब उसे अपना टाईम याद आ रहा था जैसे उसके भाई और उसने किया था। वैसा ही उसके साथ हो रहा है ।

  दोनो भाई अलग अलग रहने लगते है। दोनो बहुत ही खुश थे। एक दिन जब मुनीश के दोनो छोटे बेटे खेल रहे थे । तो खेल खेल मे उसके एक बेटे ने बोला कि वो भी बढ़ा होकर अपना एक घर बनाएगा । बंटवारे की दीवार की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि वो इस से भी बड़ी दीवार बनाएगा । सुनील की पत्नी यह बात सुन के हैरान रह गई और उसे अपना भविष्य दिखाई देने लगा । जैसा उन्होंने किया वैसा ही उनके साथ होने वाला है उसे पता लग चुका था ।

 कभी भी बाहर वालो की बातो मे आकर अपना नुकसान नही करना चाहिए । यह कहानी से यह भी सीख मिलती है कि जैसा करोगे वैसा ही भरोगे। 

    

        

Wednesday, September 12, 2018

कहानी (kahani)- समंदर की लहरों सा गुस्सा | Samndar ki laharo sa gussa | Hindi Kahani


गुस्सा, अच्छी भली आँखो वाले इंसान को भी अंधा  कर दे। इस अंधेपन मे किसी को क्या और कितना नुकसान हो जाए, यह तो बाद मे ही पता चलता है। कुछ ऐसी ही कहानी मेरी है । बात उन दिनो की है जब मुझे नौकरी मिली ही थी। मेरे गुस्सैल स्वभाव का दफ्तर मे अभी किसी को पता नही था ।

   

      बचपन से ही मेरा स्वभाव गुस्सैल था। अपने साथियो और घर के लोगो से अपनी हर बात मनवाना अगर कोई ना माने तो गुस्सा,  हर बात पर जल्दबाजी मानो जैसे मेरी आदत ही बन गई हो। मेरे माता-पिता ने मुझे बहुत समझाया पर मैं खुद को उन से ज्यादा समझदार मानता था ।

पढ़े कहानी - अन्तर

     मेरी यही आदत दफ्तर मे भी जारी रही। अपने साथियो से छोटी छोटी बात पर बहस पडना। अगर काम ज्यादा मिल जाए तो गुस्सा आ जाना , मानो मुझे कभी भी  adjustment करना आता ही ना हो।

     मेरे इस स्वभाव के कारण मुझे सब नफरत करने लगे । इसी नफरत के चलते मेरे सीनियर ने मुझे ज्यादा काम दे दिया । मैंने गुस्से मे आकर काम करने से मना कर दिया और  सीनियर के साथ बहस हो गई । यह बात हमारे मैनेजर के पास पहुंच गई । मैनेजर ने मुझे और मेरे सीनियर को  cabin मे बुलाया । वहाँ भी मैं अपने गुस्से को कंट्रोल मे नही रख सका और मैनेजर ने मुझे सस्पेंड कर दिया ।

      जब मैं घर आया मैंने अपने माता-पिता को सारी बात बताई । सब इस बात से बहुत निराशा और उदास थे लेकिन अब क्या किया जा सकता था । गुस्से के कारण मुझे बहुत नुकसान और दुख हुआ । दो दिन मैं घर पर निराश होकर  बैठा रहा । मुझे इस हालत मे देखकर मेरे पिता जी ने मुझे शाम को अपने साथ समंदर  किनारे टहलने के लिए जाने को कहा ।

     शाम को जब हम समंदर के किनारे टहल रहे थे तो पिता जी ने मुझे एक बात बताई । उन्होंने कहा बहुत पहले समंदर मे एक बार तूफान उठा था और उसने अपने आसपास के किनारो पर रह रहे लोगो को डूबा दिया और बहुत नुकसान किया ।  उन्होंने कहा देखो आज समुंदर कितना शांत है और  सभी को खूबसूरत लग रहा है । पिता जी के इतना कहते ही मैं समझ गया कि उनका इशारा मेरी तरफ ही है । मैं पिता जी की बात समझ चुका था ।

        तब से मैं समझ गया कि  समुंदर इतना विशाल होकर अपनी सीमाओं मे रहता है । अगर समुंदर मे कोई लहर   ऊँची  उठती भी है तो अपने आप शांत  हो जाती है। इंसान का गुस्सा समंदर जैसा ही होता है अगर सीमाओं से बाहर चला जाए , अपना नुकसान तो होता ही है साथ मे अपने आसपास के लोगो को भी दुख पहुंचा देता है । इसीलिए इंसान को हमेशा गुस्से पर काबू रखना चाहिए ।

Sunday, September 9, 2018

कहानी (kahani) - मंजिल और चौराहा | Manzil or churaha | Hindi kahani

छोटी उम्र से ही हमारे दिमाग के अन्दर मंजिल तक पहुंचने का चौराहा बना दिया जाता है ।इस चौराहे से सही रास्ता चुनना बहुत मुश्किल होता है । एक student जो अभी 10th मे पढ़ रहा है , उसके माता-पिता,  रिश्तेदारो और आसपास के लोगो द्वारा अभी से इस चौराहे पर खड़ा कर दिया जाता है ।

    
   Student जो अभी पढ़ाई मे बहुत अच्छा है । वो अपनी क्लास मे से हर बार अव्वल आता है । ऐसे मे उसके घर परिवार के लोग बहुत खुश होते है । उन्होंने अभी से यह सोचकर रख लिया कि student  को आगे चलकर science की पढ़ाई करवाई जाएगी ।   उसके रिश्तेदारो और आसपास के लोगो द्वारा भी यही सुझाव दिया जाता है । कोई उसे commerce  और कोई उसे arts करने की सलाह देता है । ऐसे मे student को सही रास्ता नही मिलता ।

   Student जिसे कहानियो और साहित्य से जुड़ी किताबे पढ़नी बहुत अच्छी लगती है । वो अक्सर ही इन्हे पढ़कर बहुत खुश होता और कहानियो मे लिखे पलों मे कहीं खो जाता । student दसवीं के इम्तिहान मे पास हो जाता है और अब वो घड़ी आ जाती है जिसमे उसे अपने माता-पिता,  रिश्तेदारो और अनय लोगों द्वारा तैयार किए गए चौराहे पर से एक रास्ता चुनना होता है ।

  Student दबाव मे आकर 11वीं मे साईंस की पढ़ाई करने  लगता है लेकिन कुछ ही दिनो बाद उसे महसूस होता है कि उसके द्वारा चुना गया रास्ता गलत है । उसके माता-पिता ने उसे coaching classes ज्वाइन करवा के उसकी इच्छा बिना जाने ही उस पर दबाव डाल के इस रस्ते पर चलने को मजबूर कर दिया । यह रास्ता उसे मंजिल के उल्ट एक अंधेरी दुनिया की तरफ ले जाता है ।

    जब 12वी के इम्तिहानो मे student के कम नम्बर आते है तो उसे और उसके माता-पिता को बहुत निराशा होती है । उसे अपनी मंजिल तक पहुंचना अब नामुमकिन सा लगने लगता है। अब उसके माता-पिता और आसपास के लोगो द्वारा एक और नया चौराहा बना दिया जाता है । वो खुद रास्ता बनाने मे इस लिए असफल रहता है क्योंकि निराशा से उसका दिमाग काम करना बंद कर देता है ।

     नए बनाए गए चौराहे से वो फिर से एक नया रास्ता चुन लेता है । इस बार वो डिग्री मे commerce ले लेता है। लगातार 3 साल बाद पढ़ाई करने के बाद वो एक प्राइवेट नौकरी  करने लगता है। पर वो अन्दर से बिल्कुल भी खुश नही था। इस दौरान उसके माता-पिता पिता और आसपास के लोगो द्वारा उसे बार-बार याद दिलाया जाता है कि अगर वो साईंस पढ़ लेता तो उसकी जिंदगी बन जाती ।

    Students के ऐसे हालातों का कारण उनके स्कूल भी बनते है। यहा students की नींव रटो और नकल की ईंटो से रखी जाती है । ऐसे मे जब कोई student बाहर मुकाबले के लिए जाता है तो यह नींव कमजोर दिखाई देती है ।

   Students को चाहिए कि ऐसे बनाए गए चौराहो से दूर रहे और अपने हुनर को पहचनाने की कोशिश करें। उनके द्वारा की गई सही पहचान उन्हे मंजिल तक खुद ब खुद ले जाएगी ।



Featured Post

मेहनत | Mehnat | shayari | Best Motivational shayari

कहीं तो मेहनत से बोए हुए,  खेतो के खेत डूब जाते है । और कहीं जमीन jameen पर यूं ही बिखरे हुए बीज भी उग आते है। कई तो सात जन्मों की कसमे...